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Tuesday, 2 October 2018

तू हवा है तो करले अपने हवाले मुझको

तू हवा है तो करले अपने हवाले मुझको
इससे पहले की कोई और बहाले मुझको
आइना बनके गुजारी है ¨जदगी मैंने
टूट जाउंगा बिखरने से बचाले मुझको
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प्यास बुझ जाए तो शबनम खरीद सकता हूं
जख्म मिल जाए तो मरहम खरीद सकता हूं
ये मानता हूं मैं दौलत नहीं कमा पाया मगर,
तुम्हारा हर एक गम खरीद सकता हूं।

Monday, 1 October 2018

मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाऊँगा

मैं वहीं पर खड़ा तुमको मिल जाऊँगा,
जिस जगह जाओगे तुम मुझे छोड़ कर।
अश्क पी लूँगा और ग़म उठा लूँगा मैं,
सारी यादों को सो जाऊंगा ओढ़ कर ।। 
जब भी बारिश की बूंदें भिगोयें तुम्हें
सोच लेना की मैं रो रहा हूँ कहीं,
जब भी हो जाओ बेचैन ये मानना
खोल कर आँख में सो रहा हूँ कहीं,
टूट कर कोई केसे बिखरता यहाँ
देख लेना कोई आइना तोड़ कर;
मैं वहीं पर खड़ा तुमको.......

रास्ते मे कोई तुमको पत्थर मिले
पूछना कैसे जिन्दा रहे आज तक,
वो कहेगा ज़माने ने दी ठोकरें
जाने कितने ही ताने सहे आज तक,
भूल पाता नहीं उम्रभर दर्द जब
कोई जाता है अपनो से मुंह मोड़ कर;
मैं वहीं पर खड़ा तुमको......

मैं तो जब जब नदी के किनारे गया
मेरा लहरों ने तन तर बतर कर दिया,
पार हो जाऊँगा पूरी उम्मीद थी
उठती लहरों ने पर मन में डर भर दिया,
रेत पर बेठ कर जो बनाया था घर
आ गया हूँ उसे आज फिर तोड़ कर;
मैं वहीं पर खड़ा तुमको.......

Sunday, 30 September 2018

ज़मीन जल रही है फिर भी चल रहा हूँ 

ज़मीन जल रही है फिर भी चल रहा हूँ मैं
फ़िज़ा का वक़्त हैं और फूल फल रहा हूँ मैं
हर तरफ आंधिया हैं नफरतो की मैं फिर भी
दीया हूँ प्यार का हिम्मत से जल रहा हूँ मैं

बनेगी बात नई सोच बदल कर देखो
रहो कही भी मगर ख्वाब महल के देखो
खुलेंगी खिड़किया और आसमां अपना होगा
जरा हिम्मत करो और घर से निकल कर देखो
आसमां छूलो अगर तुम तो भूल मत जाना
ये ही डोला गुरूर का है झूल मत जाना
करो भला जो किसी का तो याद मत रखना
करे तुम्हारा भला उसको भूल मत जाना

हम तो वरदान को ही शाप समझ बैठे है
सामने पुण्य है और पाप समझ बैठे है
पहले माँ बाप को दौलत ही समझते थे हम
आज दौलत को ही माँ बाप समझ बैठे है

बदलते वक़्त में ये कैसा दौर आया है
हमी से दूर हो रहा हमारा साया है
आज हम उनकी जुवा पर लगा रहे बंदिश
जिन बुजुर्गो ने हमें बोलना सिखाया है

लकीरे हाथ की जो अपनी पढ़ नहीं सकते
हवा खिलाफ हो तो उससे लड़ नहीं सकते
जो अपने घर के बुजुर्गो की करे अनदेखी
मेरा दावा है कि वो आगे बढ़ नहीं सकते

वो भी क्या दिन थे खयालो में ही खो जाते थे
कोई मजाक भी करता था तो रो जाते थे
आज तो गोलियाँ खा के भी जागते रहते
पहले तो माँ की लोरियों से ही सो जाते थे

Friday, 28 September 2018

तुम हमारी कसम तोड़ दोहम तुम्हारी कसम तोड़ दें।

चांदनी रात में रंग ले हाथ में 
जिंदगी को नया मोड़ दे दो
तुम हमारी कसम तोड़ दो
हम तुम्हारी कसम तोड़ दें।
प्यार की होड़ में दौड़कर देखिये
झूठे बंधन सभी तोड़कर देखिये
श्याम रंग में जो मीरां ने चुनरी रंगी
वो ही चुनर जरा ओढ़कर देखिये
तुम अगर साथ दो हाथ में हाथ दो
सारी दुनिया को हम छोड़ दें।
तुम हमारी कसम.....
देखिये मत कितनी बसंती छटा
रंग से रंग मिलकर बनाते घटा
सिर्फ दो अंक का प्रश्न हल को मिला
योग करना था तुमने दिया है घटा
एक है अंक हम, एक हो अंक तुम
आओ दोनों को यूँ जोड़ दें
तुम हमारी कसम तोड़ दो हम तुम्हारी कसम तोड़ दें।
आओ मेहँदी महावर की शादी करें
उम्र भर साथ रहने की आदी करें
फूल से पंखुड़ी अब न होगी ज़ुदा
सारे उद्यान में ये मुनादी करें
मुझको जितना दिखा तुमको उतना लिखा
अब ये पन्ना यहीं मोड़ दें
तुम हमारी कसम तोड़ दो हम तुम्हारी कसम तोड़ दें।।

Thursday, 27 September 2018

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।
तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं।
मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया
ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये,
आस मन में लिये प्यास तन में लिये
कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये,
तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ, ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं।
मैं तो होली मना लूँगा सच मानिये
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो,
मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पँखों को आकाश दो,
उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम, यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं।
आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी
बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं,
जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में
मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो, मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं। 

Wednesday, 26 September 2018

जब बसने का मन मैं न हो होंसला,बे वजह घोसला मत बनाया करो,

जब बसने का मन मैं न हो होंसला,
बे वजह घोसला मत बनाया करो,
और उठा न सको तुम गिरे फूल तो,
इस तरह डालिय मत हिलाया करो!
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वो समंदर नहीं था थे आंसू मेरे,
जिनमे तुम तेरते और नहाते रहे ,
एक हम थे की आखो की इस झील मैं,
बस किनारे पे डुबकी लगाते रहे !
मछलिय सब झुलस जाऐगी झील की,
अपना पूरा बदन मत डुबाया करो!
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वो हमे क्या संभालेंगे इस भीड़ मैं,
जिनपे अपना दुप्पटा संभालता नहीं,
कैसे मन को मैं कह दू की सु कोमल है ये,
फूल को देख केर के मचलता नहीं!
जिनके दीवारों दर है बने मोम के,
उनके घर मैं न दीपक जलाया करो !
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इन पतंगो को देखो यह उडती यहाँ,
जब कटंगी तो जाने गिरेगी कहाँ,
बहती नदियों को खुद भी पता ही नहीं,
अपने प्रियतम से जाने मिलेंगी कहाँ,
जिनके होटों  पे तुम न हँसी रख सको,
उनकी आँखों मैं न आसू  ना लाया करो!
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प्रेम को ढाई अक्षर का कैसे कहें,
प्रेम सागर से गहरा है नभ से बड़ा,
प्रेम होता है दीखता नहीं मगर,
प्रेम की ही धुरी पर यह जग है खड़ा,
और प्रेम के इस नगर मं जो अनजान हो,
उसको रस्ते गलत मत बताया करो!