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Tuesday, 9 October 2018

आये है, तो कटेंगे एक रात तुम्हारी बस्ती मैं 

आये है, तो कटेंगे एक रात तुम्हारी बस्ती मैं
चाहोगे तो कर लेंगे, दो बात तुम्हारी बस्ती में
अगर मन के सुने आँगन मैं जो एक घटा बन जाओगे
कर देंगे हम गीतों की बरसात तुम्हारे आँगन मैं

Monday, 8 October 2018

कोई रस्ता है न मंज़िल न तो घर है कोई

कोई रस्ता है न मंज़िल न तो घर है कोई
आप कहिएगा सफ़र ये भी सफ़र है कोई
पास-बुक' पर तो नज़र है कि कहाँ रक्खी है
प्यार के ख़त का पता है न ख़बर है कोई
ठोकरें दे के तुझे उसने तो समझाया बहुत
एक ठोकर का भी क्या तुझपे असर है कोई
रात-दिन अपने इशारों पे नचाता है मुझे
मैंने देखा तो नहीं, मुझमें मगर है कोई
एक भी दिल में न उतरी, न कोई दोस्त बना
यार तू यह तो बता यह भी नज़र है कोई
प्यार से हाथ मिलाने से ही पुल बनते हैं
काट दो, काट दो गर दिल में भँवर है कोई
मौत दीवार है, दीवार के उस पार से अब
मुझको रह-रह के बुलाता है उधर है कोई
सारी दुनिया में लुटाता ही रहा प्यार अपना
कौन है, सुनते हैं, बेचैन 'कुँअर' है कोई

Sunday, 7 October 2018

दिलों में नफ़रतें हैं अब, मुहब्बतों का क्या हुआ, / कुँअर बेचैन

दिलों में नफ़रतें हैं अब, मुहब्बतों का क्या हुआ,
जो थीं तेरे ज़मीर की अब उन छतों का क्या हुआ ?
बगल में फ़ाइलें लिए कहाँ चले किधर चले,
छुपे थे जो किताब में अब उन ख़तों का क्या हुआ ?
ज़रा-ज़रा-सी बात पे फफक पड़े या रो पड़े,
वो बात-बात में हँसी की आदतों का क्या हुआ ?
लिखे थे अपने हाथ से जो डायरी में आपने,
नई-नई-सी ख़ुशबुओं के उन पतों का क्या हुआ ?
कि जिनमें सिर्फ़ प्यार की हिदायतें थीं ऐ 'कुँअर'
वो मन्त्र सब कहाँ गए उन आयतों का क्या हुआ ।

Saturday, 6 October 2018

बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो, / कुँअर बेचैन

बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो,
बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो ।
हम आज ऐसे किसी ज़िन्दगी के मोड़ पे हैं,
न कोई राह न घर है हमारे साथ रहो ।
तुम्हें ही छाँव समझकर हम आ गए हैं इधर,
तुम्हारी गोद में सर है हमारे साथ रहो ।
ये नाव दिल की अभी डूब ही न जाए कहीं
हरेक साँस भँवर है हमारे साथ रहो ।
ज़माना जिसको मुहब्बत का नाम देता रहा,
अभी अजानी डगर है हमारे साथ रहो ।
इधर चराग़ धुएँ में घिरे-घिरे हैं 'कुँअर'
उधर ये रात का डर है हमारे साथ रहो ।

Friday, 5 October 2018

मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ / कुँअर बेचैन

मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ
जिन्दगी आ, तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ
जिसमें माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो
चाहता हूँ मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूँ
हाँ, मुझे उड़ना है लेकिन इसका मतलब यह नहीं
अपने सच्चे बाज़ुओं में इसके-उसके पर रखूँ
आज कैसे इम्तहाँ में उसने डाला है है मुझे
हुक्म यह देकर कि अपना धड़ रखूँ या सर रखूँ
कौन जाने कब बुलावा आए और जाना पड़े
सोचता हूँ हर घड़ी तैयार अब बिस्तर रखूँ
ऐसा कहना हो गया है मेरी आदत में शुमार
काम वो तो कर लिया है काम ये भी कर रख रखूँ
खेल भी चलता रहे और बात भी होती रहे
तुम सवालों को रखो मैं सामने उत्तर रखूँ

Thursday, 4 October 2018

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया / कुँअर बेचैन

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया 
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया 

सूखा पुराना ज़ख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया 

आतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया 

आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया 

अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया

ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे ज़माने का शुक्रिया 

अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया