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Friday, 12 October 2018
Monday, 10 September 2018
मुद्दतों बाद मेरा फिर आज, उस गली में जाना हुआ
मुद्दतों बाद मेरा फिर आज, उस गली में जाना हुआ ,की उन हैरान सी नज़रों से, नज़रों का यूँ टकराना हुआ।
उसे भी इल्म था शायद, तभी तो फेर लीं नज़रें, मेरा खुद शर्म से अपनी, नजर को भी झुकाना हुआ ।
न ही उसकी खता थी कुछ, न तो कसूर मेरा था, जरा हालात थे नासाज़, पर कहाँ उसको बताना हुआ ।
उसे अब भी नहीं मुझसे है, कोई भी गिला यारों, कि उसने बस यही पुछा, बताओ कैसे फिर आना हुआ ।
जुबान फिर खुल नहीं पायी, वहां जब तक रहा था मैं, मेरा बिन बोले वहां से यूँ, लौटकर आना हुआ ।
थे उनमे अनकहे कुछ दर्द, कुछ मुझसे शिकायत भी, अचानक देखकर मुझको यूँ, उनका चौंक जाना हुआ ।
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