Thursday, 30 October 2025

सच बात पूछती हूँ, बताओ ना, बाबू जीछुपाओ ना, बाबू जीक्या याद मेरी आती नहीं?

सच बात पूछती हूँ, बताओ ना, बाबू जी
छुपाओ ना, बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं?
सच बात पूछती हूँ, बताओ ना, बाबू जी
छुपाओ ना, बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं?
क्या याद मेरी आती नहीं?
क्या याद मेरी आती नहीं?
पैदा हुई, घर में मेरे मातम सा छाया था
पापा तेरे खुश थे, मुझे माँ ने बताया था
ले-ले के नाम प्यार जताते भी मुझे थे
आते थे कहीं से तो बुलाते भी मुझे थे
मै हूँ नहीं तो किसको बुलाते हो, बाबू जी?
क्या याद मेरी आती नहीं?
हर ज़िद मेरी पूरी हुई, हर बात मानते
बेटी थी मगर बेटों से ज्यादा थे जानते
घर में कभी होली, कभी दीपावली आई
Sandal भी मेरी आई, मेरी frock भी आई
अपने लिए बंडी भी ना लाते थे बाबू जी
क्या कमाते थे बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं?
सारी उम्र खर्चे में, कमाई में लगा दी
दादी बीमार थी तो दवाई में लगा दी
पढ़ने लगे हम सब तो पढाई में लगा दी
बाक़ी बचा, वो मेरी सगाई में लगा दी
अब किसके लिए इतना कमाते हो, बाबू जी?
बचाते हो, बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं?
कहते थे, "मेरा मन कहीं एक पल ना लगेगा
बिटिया विदा हुई तो ये घर, घर ना लगेगा"
कपड़े, कभी गहने, कभी सामान सँजोते
तैयारियाँ भी करते थे, छुप-छुप के थे रोते
कर-कर के याद अब तो ना रोते हो, बाबू जी?
ना रोते हो, बाबू जी?
क्या याद मेरी आती नहीं?
कैसी परंपरा है ये, कैसा विधान है
पापा, बता ना कौन सा मेरा जहान है?
आधा यहाँ, आधा वहाँ, जीवन है अधुरा
पीहर मेरा पूरा है, ना ससुराल है पूरा
क्या आपका भी प्यार अधूरा है, बाबू जी?
ना पूरा है, बाबू जी
क्या याद मेरी आती नहीं?
क्या याद मेरी आती नहीं?
क्या याद मेरी आती नहीं?

Tuesday, 28 October 2025

यह सत्य है, परम सत्य है कि हम सब आज अपना ख्वाब जी रहे हैं। आदरणीय कुमार विश्वास सर की उपस्थिति में काव्य पाठ करना तमाम लोगों का ख्वाब है और इस ख्वाब को हकीकत बनाने का काम ये डिजिटल खिड़की और गिरीशाला ने किया है। मैं बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। मैं गीत पढ़ने से पहले उसकी भूमिका में एक मुक्तक पढ़ता हूं। आप सबका आशीर्वाद मिले। स्वागत पढ़ो। यूं ही नहीं दीवाना अकबक होता है। कुछ ख्वाबों का टूटना घातक होता है। यूं ही नहीं दीवाना अकबक होता है। कुछ ख्वाबों का टूटना घातक होता है। खुशियां जब भी दर पर दस्तक देती हैं। खुशियां जब भी दर पर दस्तक देती हैं। हमको अपनी किस्मत पे शक होता है। [प्रशंसा] हूं मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर हाय हाय मुक्त करता हूं मैं मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर पर सभी का बदलता समय है प्रिय [संगीत] [प्रशंसा] बेटा क्या बात है जिंदाबाद जिंदाबाद [प्रशंसा] बहुत अच्छे बहुत-बहुत धन्यवाद मुरारी बेटा बहुत अच्छे पढ़ो वाह मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर पर सभी का बदलता समय है प्रिय पर सभी का बदलता समय है प्रिय मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर बंद अब बदलना तुम्हारा तो है लाजमी वाह वाह वाह लुट चुका है हमारा सहारा भी अपने कानों को तुम खोल कर सुन लो ये मन परेशान है पर नहारा भी वाह वाह वाह बहुत अच्छे अब बदलना तुम्हारा तो है लाजमी लुट टूट चुका है हमारा सहारा भी अपने कानों को तुम खोल कर सुन लो ये मन परेशान है पर नहारा भी देह मानव की ध है जिसने यहां आए हाए हा देह मानव की धारी है जिसने यहां उसका कष्टों से लड़ना तो तय है प्रिय [संगीत] मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर गीत का दूसरा और आखरी बंद है आपके समक्ष बहुत बच्चे रहो बेटा मुरारी जीते रहो बेटा देखिए दुख अलग-अलग प्रकार के होते हैं मेरा कैसा दुख है मेरे दुख वो नहीं प्रेम में जो मिले बहुत अच्छे मुफसी का हूं मैं तो सताया हुआ [प्रशंसा] [प्रशंसा] मेरे दुख वो नहीं प्रेम में जो मिले मुफलिसी किसी का मैं तो सताया हुआ राबता करना [संगीत] मात खाया हुआ कुछ भी सोचा हुआ कर नहीं पा रहा कुछ भी सोचा हुआ कर नहीं पा रहा ऐसी जीवन में आई प्रलय मुक्त करता हूं मैं जाना चाहो अगर बहुत-बहुत धन्यवाद [प्रशंसा] हट जा

बाबा जानी करवट लेकर हल्की सी आवाज में बोले

बाबा जानी करवट लेकर हल्की सी आवाज में बोले बेटा कल क्या मंगल होगा गर्दन मोड़े बिन मैं बोला बाबा कल तो बुध का दिन है

बाबा जानी सुन ना पाए फिर से पूछा कल क्या दिन है थोड़ी गर्दन मोड़ के मैंने लहजे में कुछ जहर मिलाकर मुंह को कान की सीद में लाकर धाड़ के बोला बुध है बाबा बुध है बाबा आंखों में दो मोती जमके सूखे से दो होठ भी लजे लहजे में कुछ शहद मिलाकर बाबा बोले बैठो बेटा छोड़ो दिन को दिन है पूरे मुझ में तेरा हिस्सा सुन लो बचपन का एक किस्सा सुन लो यही जगह थी मैं था तुम थे तुमने पूछा रंग बिरंगी फूलों पर ये उड़ने वाली इसका नाम बताओ बाबा गाल पे बोसा देकर मैंने प्यार से बोला तितली बेटा तुमने फिर पूछा क्या बाबा मैं बोला तितली बेटा तितली
तितली कहते सुनते एक महीना पूरा गुजरा एक महीना पूछ के बेटा तितली कहना सीखा तुमने हर एक नाम जो सीखा तुमने कितनी बार वो पूछा तुमने तेरे भी तो दांत नहीं थे मेरे भी अब दांत नहीं है बातें करतेकरते तू तो थक के मेरी गोद में सो जाता था तेरे मेरे पास तो बाबा थे ना। मेरे पास तो बेटा है ना। बूढ़े से इस बच्चे के भी बाबा होते सुन भी लेते। पर मेरे पास तो बेटा है ना। तेरे पास तो बाबा थे ना। मेरे पास तो बेटा है ना।



Thursday, 9 October 2025

गुस्से की दवा.

*गुस्से की दवा..* 

एक स्त्री थी। उसे बात बात पर गुस्सा आ जाता था। उसकी इस आदत से पूरा परिवार परेशान था। उसकी वजह से परिवार में कलह का माहौल बना रहता था। एक दिन उस महिला के दरवाजे एक साधू आया। महिला ने साधू को अपनी समस्या बताई। उसने कहा, “महाराज! मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। मैं चाहकर भी अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाती। कोई उपाय बताइये।” साधू ने अपने झोले से एक दवा की शीशी निकालकर उसे दी और बताया कि जब भी गुस्सा आये। इसमें से चार बूंद दवा अपनी जीभ पर डाल लेना। 10 मिनट तक दवा को मुंह में ही रखना है। 

10 मिनट तक मुंह नहीं खोलना है, नहीं तो दवा असर नहीं करेगी।” महिला ने साधू के बताए अनुसार दवा का प्रयोग शुरू किया। सात दिन में ही उसकी गुस्सा करने की आदत छूट गयी। सात दिन बाद वह साधू फिर उसके दरवाजे आया तो महिला उसके पैरों में गिर पड़ी। उसने कहा, “महाराज! आपकी दवा से मेरा क्रोध गायब हो गया। अब मुझे गुस्सा नहीं आता और मेरे परिवार में शांति का माहौल रहता है।” तब साधू महाराज ने उसे बताया कि वह कोई दवा नहीं थी। उस शीशी में केवल पानी भरा था। 

 *शिक्षा* : गुस्से का इलाज केवल चुप रहकर ही किया जा सकता है। क्योंकि गुस्से में व्यक्ति उल्टा सीधा बोलता है, जिससे विवाद बढ़ता है। इसलिए क्रोध का इलाज केवल मौन है..!!

Saturday, 27 September 2025

इंडस नदी डॉल्फिन और माइक्रोप्लास्टिक संकट

*📌* *इंडस नदी डॉल्फिन और माइक्रोप्लास्टिक संकट*

हाल के एक शोध में खुलासा हुआ है कि इंडस नदी की डॉल्फिन अपने भोजन के साथ बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक निगल रही हैं। पांच फंसी हुई डॉल्फिन के पेट और आंतों की जांच में पाया गया कि उनके शरीर में माइक्रोप्लास्टिक, विशेष रूप से टेक्सटाइल फाइबर और पैकेजिंग में उपयोग होने वाले पीईटी (पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट) जैसे प्लास्टिक मौजूद थे। ये माइक्रोप्लास्टिक विशेष रूप से छोटी आंत में अधिक मात्रा में पाए गए। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये माइक्रोप्लास्टिक डॉल्फिन के शरीर में सीधे निगलने या दूषित शिकार (मछलियां) के माध्यम से पहुंच रहे हैं। इंडस नदी की डॉल्फिन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का एक महत्वपूर्ण संकेतक हैं, और यह स्थिति नदी के बढ़ते प्रदूषण को दर्शाती है।

*परिणाम एवं चुनौतियाँ*

माइक्रोप्लास्टिक का डॉल्फिन के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। ये सूक्ष्म कण आंतरिक अंगों में जमा होकर पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे भोजन अवशोषण की क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा, माइक्रोप्लास्टिक में मौजूद रासायनिक तत्व, जैसे बिस्फेनॉल-ए और फ्थालेट्स, हार्मोनल असंतुलन और प्रजनन क्षमता में कमी का कारण बन सकते हैं। लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से डॉल्फिन की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। यह स्थिति न केवल डॉल्फिन, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा है, क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक खाद्य श्रृंखला के माध्यम से अन्य प्रजातियों तक पहुंच सकते हैं।

इंडस नदी का पारिस्थितिकी तंत्र पहले ही मानवीय गतिविधियों, जैसे औद्योगिक प्रदूषण, कृषि अपवाह और अनुपचारित सीवेज के कारण दबाव में है। माइक्रोप्लास्टिक का बढ़ता स्तर नदी के जल की गुणवत्ता को और खराब कर सकता है, जिसका असर न केवल जलीय जीवों, बल्कि नदी पर निर्भर मानव समुदायों पर भी पड़ेगा।

*आगे की राह*

इंडस नदी डॉल्फिन, जो विश्व की सबसे दुर्लभ जलीय स्तनधारियों में से एक हैं, के संरक्षण के लिए माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। यह पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, और सतत विकास जैसे विषयों से जुड़ा है। माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का मुकाबला करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप, जैसे प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध, और औद्योगिक अपशिष्ट के निपटान के लिए कड़े नियम लागू करना जरूरी है। इसके अलावा, नदियों के संरक्षण के लिए सामुदायिक जागरूकता और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा।
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Saturday, 20 September 2025

कितना सुंदर लिखा है किसी ने.....

कितना सुंदर लिखा है किसी ने.....

प्यास लगी थी गजब की, मगर पानी मे जहर था...
पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते !!

बस यही दो मसले, जिंदगी भर ना हल हुए,
ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए !!

वक़्त ने कहा... काश थोड़ा और सब्र होता,
सब्र ने कहा... काश थोड़ा और वक़्त होता !!

शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी,
पर चुप इसलिये हु कि जो दिया तूने,
वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता..!!🌸❤️🕊️

Monday, 15 September 2025

मान लीजिए कि आप चाय का कप हाथ में लिए खड़े हैं और कोई आपको धक्का दे देता है,

मान लीजिए कि आप चाय का कप हाथ में लिए खड़े हैं और कोई आपको धक्का दे देता है,
तो आपके कप से चाय छलक जाती है..

अब अगर आप से पूछा जाए कि आप के कप से चाय क्यों छलकी?

तो आप का उत्तर होगा "क्योंकि उसने ने मुझे धक्का दिया"

गलत उत्तर..

सही उत्तर ये है कि आपके कप में चाय थी इसलिए छलकी..!

आप के कप से वही छलकेगा जो उसमें है।

इसी तरह जब ज़िंदगी में हमें धक्के लगते हैं
बातों से, व्यवहार से, विचार से और स्वाभाविक प्रक्रिया से, तो उस समय हमारी वास्तविकता ही बाहर छलकती है।

आप का सच उस समय तक सामने नहीं आता, जब तक आपको धक्का न लगे, तो देखना ये है कि जब आपको धक्का लगा तो क्या छलका?

धैर्य, मौन, कृतज्ञता, स्वाभिमान, निश्चिंतता, मानवता, गरिमा, अपनत्व, सहानुभूति, संवेदना इत्यादि..

या फिर,

क्रोध, कड़वाहट, पागलपन, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, अराजकता, असभ्यता, असंवेदनशीलता इत्यादि..

Monday, 8 September 2025

यदि आपके पास अहंकार भाव हैं तो समझ लेना अब आपको किसी और शत्रु की जरुरत ही नहीं हैं।

यदि आपके पास अहंकार भाव हैं तो समझ लेना अब आपको किसी और शत्रु की जरुरत ही नहीं हैं।

क्योंकि अहंकार वो सब काम कर देगा 
 
जो काम शायद ही कोई महाशत्रु भी नहीं कर सकें।

अहंकार शक्तिशाली ही नहीं महा शक्तिशाली शत्रु होता हैं।

वो अहंकार ही तो था जिसके बल पर रावण ने साक्षात त्रिभुवनपति श्रीराम जी को ही चुनौती दे डाली, 

जिसके बल पर कंस ने जगत पालक को बालक मान कर उसे मारने के प्रयत्न शुरू कर दिए,

जिसके बल पर दुर्योधन ने एक सती नारी के चीर हरण करने का आदेश भरी सभा में दे दिया था,

अहंकार आग की वो धधकती लपटें हैं, जो गर्म तो नहीं मगर जलाकर राख अवश्य कर देती हैं।

अतः अहंकार में नहीं 
अपितु प्यार और उपकार में जीने का प्रयास शुरू करके अपने जीवन के अर्थ को सार्थक करें..!

Monday, 1 September 2025

🟡संस्कार🟡

एक राजा के पास सुंदर घोड़ी थी। कई बार युद्ध में इस घोड़ी ने राजा के प्राण बचाए और घोड़ी राजा के लिए पूरी वफादार थी, कुछ दिनों के बाद इस घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया, बच्चा काना पैदा हुआ, पर शरीर हृष्ट पुष्ट व सुडौल था।

बच्चा बड़ा हुआ, बच्चे ने मां से पूछा- मां मैं बहुत बलवान हूं, पर काना हूं...। यह कैसे हो गया, इस पर घोड़ी बोली- बेटा जब मैं गर्भवती थी, तब राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया, जिसके कारण तू काना हो गया। यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला- मां मैं इसका बदला लूंगा।

मां ने कहा, राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है। तू जो स्वस्थ है, सुन्दर है, उसी के पोषण से तो है। यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुचाएं। मगर, उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया। उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की ठान ली।

वह लगातार राजा से बदला लेने के बारे में सोचता रहता था और एक दिन यह मौका घोड़े को मिल गया। राजा उसे युद  पर ले गया। युद्व लड़ते-लड़ते राजा एक जगह घायल हो गया। घोड़े के पास राजा को युद्ध के मैदान में छोड़कर भाग निकलने का पूरा मौका था।

यदि वह ऐसा करता, तो राजा या तो पकड़ा जाता या दुश्मनों के हाथों मार दिया जाता। मगर, उस वक्त घोड़े के मन में ऐसा कोई ख्याल नहीं आया और वह राजा को तुरंत उठाकर वापिस महल ले आया। इस पर घोड़े को ताज्जूब हुआ और उसने मां से पूछा- मां आज राजा से बदला लेने का अच्छा मौका था, पर युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही राजा से बदला ले पाया।

मन ने गवाही नहीं दी, राजा से बदला लेने की। ऐसा क्यों हुआ। इस पर घोडी हंस कर बोली- बेटा तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानबूझकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है। तुझसे नमक हरामी हो नहीं सकती, क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है। मेरे संस्कार और सीख को तू कैसे झुठला सकता था।

वाकई.. यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते हैं, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है। हमारे पारिवारिक-संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ जाते हैं, माता-पिता जिस संस्कार के होते हैं, उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते हैं। हमारे कर्म ही 'संस्‍कार' बनते हैं और संस्कार ही प्रारब्धों का रूप लेते हैं । यदि हम कर्मों को सही व बेहतर दिशा दे दें, तो संस्कार अच्छे बनेंगे और संस्कार अच्छे बनेंगे, तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा, वह अच्छा होगा।

शिक्षा:-
हमें प्रतिदिन कोशिश करनी होगी कि हमसे जानबूझकर कोई गलत काम न हो और हम किसी के साथ कोई छल कपट या धोखा भी न करें। बस, इसी से ही स्थिति अपने आप ठीक होती जाएगी और हर परिस्थिति में प्रभु की शरण न छोड़ें तो अपने आप सब अनुकूल हो जाएगा..!!

Friday, 11 July 2025

💫 जो बोओगो वहीं काटोगो.💫

. *💫 जो बोओगो वहीं काटोगो.💫* 

एक गांव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का कार्य करता था ! एक दिन उसकी बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वह उसे बेचने शहर गया वह मक्खन गोल पेड़े की शक्ल में था तथा हर पेड़े का वजन 1 किलो था !

शहर में किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया और दुकानदार से चाय चीनी तेल साबुन वगैरह खरीदकर अपने गांव रवाना हो गया
 
किसान के जाने के बाद दुकानदार ने एक पेड़े का वजन किया तो पेड़ा 900 ग्राम का निकला फिर तो उस दुकानदार ने हर पेड़े का वजन किया परंतु सभी 900 ग्राम के निकले अगले हफ्ते किसान फिर से हमेशा की तरह मक्खन लेकर दुकानदार की दहलीज पर चढ़ा तो दुकानदार ने चिल्लाते हुए किसान से कहा दफा हो जाओ किसी बेईमान और धोखेबाज शख्स से मुझे कारोबार नहीं करना 900 ग्राम मक्खन को 1 किलो बताकर बेचने वाले शख्स की शक्ल भी नहीं देखना चाहता हूँ.

तब किसान बड़ी विनम्रता से बोला भाई हम तो गरीब,बेचारे लोग हैं हमारे पास माल तोलने के लिए बाट (वजन) खरीदने की हैसियत कहां है ! मैं तो आपसे जो 1 किलो चीनी लेकर जाता हूं ! उसी को तराजू के एक पलड़े में रखकर दूसरे पलड़े में उतने ही वजन का मक्खन तोल कर ले आता हूं.

 *भाइयों..* हम जो दूसरों को देंगे वही लौटकर आएगा चाहे वह इज्जत हो,मान-सम्मान हो या चाहे धोखा हो !