ना जाने क्या करती है वो , क्या प्यार मुझे करती है वो, गर करती है तो चुप क्यों है, किस बात से फिर डरती है वो
यूँ तो है मुझसे दूर बहुत, पर पास मेरे रहती है वो, मैं खुद से पराया हूँ लेकिन, मुझको अपना कहती है वो कभी रुलाती कभी हंसाती, एक सपना सा लगती है वो सोता है जब यह जहाँ सारा, मेरी आँखों में जगती है वो
यूँ तो है मुझसे दूर बहुत, पर पास मेरे रहती है वो, मैं खुद से पराया हूँ लेकिन, मुझको अपना कहती है वो कभी रुलाती कभी हंसाती, एक सपना सा लगती है वो सोता है जब यह जहाँ सारा, मेरी आँखों में जगती है वो
ना जाने क्या करती है वो, क्या प्यार मुझे करती है वो, गर करती है तो चुप क्यों है, किस बात से फिर डरती है वो
छुप कर अपनी आँखों से, मेरे चेहरे को पढ़ती है वो हलकी कोई खुमारी बन, मेरी रग-रग में चढ़ती है वो हर शाम ढले आ जाती है, मेरी आहों में बसती है वो दिल की जब भी कुछ कहता हूँ,मेरी बातों पर हंसती है वो
ना जाने क्या करती है वो, क्या प्यार मुझे करती है वो गर करती है तो चुप क्यों है, किस बात से फिर डरती है वो
मेरे तपते रेगिस्तानों में,एक झरने सी बहती है वो मेरे गहरे-गहरे जख्मों को,अपने तन पर सहती है वो सुनसान अकेली राहों पर, मेरा साया बन चलती है वो ठन्डे बर्फ के टुकड़े सी,मेरे जिस्म को छू गलती है वो
छुप कर अपनी आँखों से, मेरे चेहरे को पढ़ती है वो हलकी कोई खुमारी बन, मेरी रग-रग में चढ़ती है वो हर शाम ढले आ जाती है, मेरी आहों में बसती है वो दिल की जब भी कुछ कहता हूँ,मेरी बातों पर हंसती है वो
ना जाने क्या करती है वो, क्या प्यार मुझे करती है वो गर करती है तो चुप क्यों है, किस बात से फिर डरती है वो
मेरे तपते रेगिस्तानों में,एक झरने सी बहती है वो मेरे गहरे-गहरे जख्मों को,अपने तन पर सहती है वो सुनसान अकेली राहों पर, मेरा साया बन चलती है वो ठन्डे बर्फ के टुकड़े सी,मेरे जिस्म को छू गलती है वो
ना जाने क्या करती है वो, क्या प्यार मुझे करती है वो गर करती है तो चुप क्यों है, किस बात से फिर डरती है वो
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