Sunday, 9 September 2018

अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं…

हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैंभीड़ बहुत है, इस मेले में खो सकता हूँ मैंपीछे छूटे साथी मुझको याद आ जाते हैं वरना दौड़ में सबसे आगे हो सकता हूँ मैंकब समझेंगे जिनकी ख़ातिर फूल बिछाता हूँ इन रस्तों पर कांटे भी तो बो सकता हूँ मैंइक छोटा-सा बच्चा मुझ में अब तक ज़िंदा है 
छोटी छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं सन्नाटे में दहशत हर पल गूँजा करती है इस जंगल में चैन से कैसे सो सकता हूँ मैंसोच-समझ कर चट्टानों से उलझा हूँ वरना बहती गंगा में हाथों को धो सकता हूँ मैंहाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं भीड़ बहुत है, इस मेले में खो सकता हूँ मैं

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